View in ENGLISH  
       
    0734-2557351  
    segjivobsujj@mp.gov.in  

 Prachin Yantra
सम्राट यंत्र:

इस यंत्र के बीच की सीढ़ी की दीवालों की ऊपरी सतह पृथ्वी की धुरी के समानान्तर होने के कारण दीवालों के ऊपरी धरातल की सीध में रात्रि को ध्रुव तारा दिखाई देता है। इसके पूर्व तथा पश्चिम की ओर विषुवद् वृत्त धरातल में समय बतलाने के लिये एक चैथाई गोल भाग बना हुआ है । जिस पर घण्टे, मिनट एवं मिनट का तीसरा भाग खुदे हुए हैं।

जब आकाश में सूर्य चमकता है तब दीवाल के किनारे की छाया पूर्व या पश्चिम तरफ के समय बतलाने वाले किसी निशान पर दिखाई देती है । इस निशान पर घण्टा, मिनट आदि की गिनती से उज्जैन का स्पष्ट (स्थानीय) समय ज्ञात होता है । यंत्र के पूर्व तथा पश्चिम बाजू में लगी सारणी में लिखे अनुसार मिनट इस स्पष्ट समय में जोड़ने से भारतीय मानक समय ज्ञात होता है।

आकाश में ग्रह नक्षत्र विषुवद् वृत्त से उत्तर तथा दक्षिण में कितनी दूर हैं, यह जानने के लिये इस यंत्र का उपयोग किया जाता है। चैथाई गोल के किनारे पर किसी ऐसे स्थान को ज्ञात कीजिये जहाॅं से सीढ़ी की दीवाल के किनारे के किसी बिन्दु पर ग्रह-नक्षत्र का केन्द्र दिखाई दे, दीवाल के उस बिन्दु पर जो अंक हेैं, वह उस देखे गये ग्रह नक्षत्र की दूरी होती है, जिसे क्रांति कहते हैं।
  Samrat Yantra Jiwaji Observatory
 
 
नाड़ी वलय यंत्र :

विषुवद् वृत्त के धरातल में निर्मित इस यंत्र के उत्तर-दक्षिण दो भाग हैं। छः माह जब तक कि सूर्य उत्तरीय गोलार्द्ध में रहता है। उत्तर का गोल भाग प्रकाशित रहता है तथा दूसरे छः माह तक जबकि सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है, दक्षिण का गोल भाग प्रकाशित रहता है। इन दोनों भागों के बीच में पृथ्वी की धुरी के समानान्तर लगी कीलों की छाया से उज्जैन का स्पष्ट समय ज्ञात होता है।

कोई भी ग्रह अथवा नक्षत्र उत्तरीय आधे गोल में हैं या दक्षिणी आधे गोल में, यह जानने के लिये इस यंत्र का उपयोग किया जाता है। उत्तरीय भाग के गोल किनारे के किसी उपयुक्त बिन्दु से सीधे अभीष्ट ग्रह नक्षत्र को देखिये, यदि वह दिखाई देता है तो उसे उत्तर गोलार्द्ध में अन्यथा दक्षिण गोलार्द्ध में समझिये।

इसी प्रकार दक्षिण भाग से भी जानकारी होती है।
  Nadi Valay Yantra Jiwaji Observatory
 
 
भित्ति यंत्र:

यह यंत्र उत्तर-दक्षिण वृत्त (उत्तर दक्षिण बिन्दु) तथा दृष्टा के ख बिन्दु को मिलाने वाली गोल रेखा के धरातल में बना हुआ है। इस यंत्र से ग्रह-नक्षत्रों के नतांश (अपने सिरे के ऊपरी बिन्दु से दूरी) उस समय ज्ञात होते हैं, जब वे उत्तर दक्षिण गोल रेखा को पार करते हैं। यही समय उनका मध्यान्ह कहा जाता है।

यत्र के ऊपरी सिरे पर डोरे से बंधी हुई दो कीलें हैं। जिस ग्रह अथवा नक्षत्र को देखना हो, वह यदि (पूर्व-पश्चिम बिन्दु तथा ख मध्य को मिलाने वाले गोल रेखा से) दक्षिण भाग में हो तो दक्षिण की तथा उत्तर भाग में हो तो उत्तर की कील का प्रयोग कीजिये।

जिस समय ग्रह अथवा नक्षत्र उत्तर-दक्षिण गोल के पार जाने लगे, तब डोरे को अपनी आॅंख के साथ दीवाल पर ऐसी जगह कीजिये जिससे पार जाने वाला ग्रह या नक्षत्र कीले के छाया की सीध में दिखाई दे।

सफेद गोल पट्टी पर डोरे से स्पर्श , अंकित अंक से नतांश ज्ञात होते हैं।
  Samrat Yantra Jiwaji Observatory
 
 
दिगंश यंत्र:

इस यंत्र के बीच में गोल चबूतरे पर लगे लोहे के दण्ड में तुरीय यंत्र लगाने पर ग्रह-नक्षत्रों के उन्नतांश (क्षितिज से ऊॅंचाई) और दिगंश (पूर्व-पश्चिम दिशा के बिन्दु से क्षितिज वृत्त में कोणात्मक दूरी) ज्ञात होते हेंैं।

तुरीय यंत्र को इस प्रकार स्थिर कीजिये कि उसमें बने दो छेद तथा ग्रह अथवा नक्षत्र का केन्द्र अपनी आॅंख में एक सीध में हो। दण्ड के सिरे पर लगे चक्र पर तुरीय यंत्र की धूमने वाली सुई दिगंश बतलाती है।

तुरीय यंत्र पर लटकाता हुआ डोरा यंत्र के किनारे पर जिस जगह होगा वहाॅं के अंक उन्नतांश होते हैं।
  Samrat Yantra Jiwaji Observatory
 
 
शंकु यंत्र:

क्षितिज वृत्त के धरातल में निर्मित इस चबूतरे के मध्य में एक शंकु लगा हुआ है। जिसकी छाया से सात-रेखाएं खींची गयी है। जो बारह राशियों को प्रदर्शित करती हैं। इन रेखाओं में से 22 दिसम्बर वर्ष का सबसे छोटा दिन, 21 मार्च एवं 23 सितम्बर दिन-रात बराबर तथा 21 जून वर्ष का सबसे बड़ा दिन बतलाती है।

शंकु की छाया से उन्नतांश भी ज्ञात किये जा सकते हैं। जब दिन-रात बराबर होते हैं तब मध्याहकालनी शंकु की छाया से अक्षांश ज्ञात होते हेैं।
  Samrat Yantra Jiwaji Observatory
 
Powered by SysTec All Copyright @2015 www.jiwajiobservatory.org Reserved Disclaimer  |  Privacy Policy